Sunday, February 12, 2017

उत्तराखंड के पारम्परिक वाद्य यन्त्र

लोक नृत्य  लोक गीत का प्रचलन प्राचीनकाल से है। लोक गीत-संगीत तथा नृत्य बिना वाद्य यंत्रो के अधूरे हैं, उत्तराखंड के लोक नृत्य और लोक गीत भी बिना वाद्य यंत्रो के अधूरे है। उत्तराखंड मैं ३६ प्रकार के वाद्य यन्त्र हैं। जिन्हे इन श्रेणी मे बांटा गया है -

  1. घन वाद्य-विणाई,कांशे की थाली,घुँघुर,मंजीरा,घाना/घानी ,केशरी,खंजरी,चिमटा,घंट,करताल।  
  2. चर्म वाद्य- ढोलकी,ढोल,दमाऊ,डौर, ढफली,डमर,हुड़का,नगाड़ा, घतिया नगाड़ा।
  3. सुषिर वाद्य-रणसिंगा,तुरही,नागफणी,शंख:-उर्ध्वमुखी नाद ,मसकबीन ,मुरुली,जैया मुरुली,भंकोरा। 
  4. तांत वाद्य - सारंगी, एकतारा ,दोतारा ,गोपी यंत्र 
  5. हारमोनियम

ढोल- दमाऊ -

उत्तराखंड मे ढोल का प्रयोग प्रचिन समय से हो रहा है,यह सबसे प्रसिद्ध वाद्य यंत्र है। इसका सर्वप्रथम नागसंघ ने युद्ध मैं वीरो को प्रोत्साहित करने को बजाया था। ढोल दमाऊ साथ साथ बजाए जाते हैं ,इनका प्रयोग मांगलिक कार्यो मैं ,धार्मिक अनुष्ठानों ,सामूहिक नृत्यों,लोक उत्सवों, पुजा यात्राओ मैं प्रयोग किया जाता हैं। ढोल तांबे और साल की लकड़ी से बना होता है इसके बाऐ पुड़ी(खाल) पर बकरी की खाल और दायीं पुडी पर भैंस या बारहसिंघा की खाल छड़ी होती हैँ। दमाऊ  तांबे का  बना यह वाद्य यंत्र एक फुट ब्यास तथा 8 इंच गहरे कटोरे के सामान होता है,इसके मुह पर मोठे चमड़े की पुड़ी (खाल) चडी होती है। ढोल को गले मैं जनेऊ की भांति दाहिने हाथ से चोट छड़ी की मदद से बजाया जाता हैं जबकि दमाऊ को गले मैं डालकर नागाड़े की तरह बजाया जाता है। 

 डौर-थाली- 

डौर को शिव यंत्र भी कहा जाता है। यह उत्तरखंड का प्रसिद्ध चर्म वाद्य है। डौर या डमरू को घुटने के बीच मैं रख कर दाहिने हाथ में छड़ी तथा बाये हाथ की उंगलियो मैं साम्य बिठा कर बजाया जाता है।इसे साड़न की ठोस लकड़ी को खोकला करके बनाया जाता है इसके दोनों और बकरे की खाल चडी होती है।  इसका प्रयोग अप्सराओ(औछरियो) के नृत्य, देवी-देवताओ के मनुष्य मैं प्रवेश करने के लिये किया जाता हैं इस यन्त्र के बिना ये  कार्य सम्भव नहीं होता। ये आज भी  प्रचलन मैं हैं। 

हुड़की-

हुड़की या हुडक यह का महत्वपूर्ण वाद्य यन्त्र हैँ ,यह बहुत ही हलका और बजाने मैं बहुत ही सरल यन्त्र हैँ। हुड़की या हडक की लंबाई एक फुट तीन इंच के लगभग होती है,इसके दोनों पूड़ियों को बकरी  की खाल से बनाया जाता हैं। हुड़की को केवल दाए हाथ से ही बजाया जाता हैं। इसका प्रयोग उत्तराखंड मैं जागर और अन्य लोक गीतों के समय होता है। 

मोछंग -

यह लोहे की पतली पट्टियों से बना वाद्य यन्त्र है जिसे होंठो पर रखकर उंगलियो से बजाया जाता है जिसमे उंगलियो के संचालन तथा हवा के द्वारा सुर निकाले जाते है। 

तुर्री और रणसिंघा -

इन्हें  युद्ध के समय सावधान या सुचना देने के लिए बजाया जाता था यह दोनों एक दूसरे से मिलते जुलते वाद्य फूंक यन्त्र हैं। यह आकार मे लंबे पीतल या तांबे के बने होते है। इन्हें  मुह की और संकरी नली मैं फंक मर के बजाया जाता है। इससे तीव्र और करकश ध्वनि निकलती है ,इसका प्रयोग देवी देवताओ की पूजा मैं किया जाता हैं। 
  

मशकबीन-

यह उत्तराखंड मैं प्रसिद्ध यूरोपियन वाद्य यन्त्र हैं इसे पहले केवल सेना के बैंडो मैं बजाया जाता था। यह कपडे का बना होता है जो  थैलीनुमा होता है इसमें 5 बाँसुरी जैसे यन्त्र लगे होते हैं इसमें एक नली  फुक मारने को होती है फूक के माध्यम से इसमें सुर निकाले जाते हैं। 
  

अलगोजा -

अलगोजा रामसोर के नाम से काफी प्रसिद्ध है ,यह बांस या मोटे रिंगाल की बनी होती है जिसे अलग अलग या साथ मै बजाया जाता है खुदेड़ एवम झुमेलो जैसे गीतों मैं अलगोजा का प्रयोग किया जाता है।  

सारंगी-

यह बाद्दी(नाच-गा  कर जीविका चलने वाले) और मिरासियों का प्रिय वाद्य यन्त्र है। 

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